आरआरबी व एनटीपीसी परीक्षा परिणाम के बाद जिस प्रकार छात्रों के बीच नाराजगी, उग्र प्रदर्शन और उहापोह में बिहार बंद से तनातनी की स्थिति बनी, उससे अभ्यर्थियों के साथ अभिभावकों की नींद भी उचट गई है। ऐसे में xposenow.com के लिए वरिष्ठ पत्रकार शंभुदेव झा ने कुछ अभिभावकों से उनकी राय पर परिचर्चा आयोजित की है। आइए आप भी जानिए आरआऱबी, सरकार और छात्रों को लेकर क्या सोचते हैं आज के अभिभावक। यहां प्रस्तुत है कुछ अभिभावकों की राय-

अवकाश प्राप्त पुलिस अधिकारी अनुरंजन कुमार हिंसक प्रदर्शन के खिलाफ हैं। वे कहते हैं कि किसी भी प्रदर्शन के दौरान विध्वंसक सोच वालों के लिए मौके की घड़ी होती है। रेल जला डालने वाले उपद्रवी ही हैं, छात्र तो कतई नहीं हो सकते वो। वे प्रशासन से कहते हैं कि सघन जांच कर दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए और निर्दोष या निर्दोष साबित होने वाले अभ्यर्थियों को हिदायत के साथ के साथ मुक्त कर दिया जाए।

महिला शिक्षाविद और एक अभिभाविका का इस घटना के बाद कहना है कि भीड़ को विवेकहीन माना जाता है और छात्र तब बेलगाम हो जाते हैं जब उन्हें गलत नेतृत्व मिल जाता है। यानि सही दिशा का प्रदर्शन गलत हाथों में जाने की संभावनाओं से विद्यार्थियों को हमेशा बचना होगा। महिला शिक्षाविद डॉ. कुमुद वर्मा मानती हैं कि अपनी राजनीति चमकाने के लिए छात्रों को उकसाया जाता रहा है।वरना उनके पास पढ़ाई के अलावा वक्त कहां होता है ऐसे हिंसक आंदोलन के लिए।सरकार को भी चाहिए कि समय पर और सही तरीके से रिजल्ट दिया करे ताकि ऐसी परिस्थिति फिर से कभी न बनें। अगर किसी कारण से रिजल्ट में देर होती है तो सीधे सीधे संस्थान प्रवक्ता या प्रतिनिधियों को छात्रों के सामने आकर सच बताया जाना चाहिए, अन्यथा विघटनकारी नेताओं द्वारा सीधे साधे और पढ़ने लिखने वाले छात्रों के गुमराह होने की संभावना बढ़ जाती है।

आगजनी के साथ सरकारी व निजी संपत्तियों को नुकसान करने की प्रवृत्ति से बचना बहुत जरूरी है। वरीय पत्रकार नवीन कुमार ने इस बावत पूछने पर बताया कि भीड़ का फायदा छद्म भेडिये उठाते हैं और बदनामी विद्यार्थियों के मत्थे आती है। ऐसे छद्म शिक्षार्थियों को छात्र समुदाय चिन्हित कर उन्हें बेनकाब करे ताकि छात्र सही ढ़ंग से अपनी बात उठा सकें और सरकार के सामने रख सकें।सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले तथाकथित स्वार्थी तत्वों की निंदा होनी ही चाहिए। नवीन कुमार कहते हैं कि यह राहतभरी खबर है कि सरकार ने छात्रों की बात सुनी-समझी और और उनकी मांगे मान ली। छात्रों को अब संयम से काम लेना चाहिए।सरकार को भी ऐसा मौका देने से बचना चाहिए,खासकर आरआरबी एनटीपीसी को।
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एक अन्य बुद्दिजीवी वर्ग अवकाश प्राप्त अधिकारी लखनदेव प्रसाद कहते हैं कि इतना सब कुछ होने के पीछे व्यवस्था की भी गलती थी। आखिर क्या कारण है कि अस्सी लाख ट्वीट किये जाने के बाद भी आरआरबी और केंद्र सरकार की नींद नहीं खुली।क्या इतने सारे ट्वीट को नजरअंदाज किया जाना उचित है। इन ट्वीटों पर काररवाई न किये जाने वाले अधिकारियों को क्यों नहीं दंडित किया जाए हमेशा सरकार ही कुंभकर्णी नीद्रा में क्यों सोई रहती है। हिंसक या अहिंसक किसी भी तरह के आंदोलन का मौका क्योंकर दिया जाता है।
दूसरी तरफ यह भी सच है कि किसी को भी हिंसक होने या हिंसक प्रदर्शन करने का अधिकार किसी भी कीमत पर नहीं है। छात्रों को तो विशेष रूप से इससे बचने की जरूरत है। संबैधानिक तरिके से छात्र अपनी बात ट्वीटर द्वारा रख रहे थे, आगे भी उन्हें ये ही तरिका अपनाना चाहिए था वो मीडिया के पास जा सकते थे, आरआऱबी, रेलमंत्री ,प्रधानमंत्री और कोर्ट के पास जा सकते थे। इन सब विकल्पों को छोड़ कर सीधे हिंसा पर उतर जाना भी घोर नींदनीय ही माना जाएगा