हमारी विभूतियां :पत्रकार-साहित्यकार रघुवीर सहाय। स्तंभ हमारी विभूतियां की आज की कड़ी समर्पित है पत्रकार-साहित्यकार रघुवीर सहाय को। साहित्य के इस विभूति को जीकेसी के ग्लोबल अध्यक्ष राजीव रंजन प्रसाद अपनी लेखनी के माध्यम से याद कर रहे हैं। आइए हम भी आज विस्तार से जानते हैं पत्रकार-साहित्यकार रघुवीर सहाय को।
बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के एक महत्त्वपूर्ण कवि थे साहित्यकार रघुवीर सहाय । उनका जन्म 9 दिसंबर, 1929 को लखनऊ में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम हरदेव सहाय एवं माता का नाम तारामणि देवी था। उनके पिता साहित्य के अध्यापक थे।
रघुवीर सहाय ने अपनी शिक्षा ‘प्रीपरेट्री स्कूल’ लखनऊ से प्रथम स्थान पर रहकर आरंभ की। चौथी कक्षा में “एंग्लो बंगाली इंटर स्कूल” में दाखिला लिया। सहाय जी ने सन् 1944 में मैट्रिक की परीक्षा पास की तथा सन् 1946 में इंटर पास किया। 1948 में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।
वे ‘नवभारत टाइम्स के सहायक संपादक तथा ‘दिनमान साप्ताहिक के संपादक रहे। बाद में वे स्वतंत्र लेखन में रत हो गए। इन्होंने प्रचुर गद्य और पद्य लिखे हैं। रघुवीर सहाय ‘दूसरा सप्तक के कवियों में हैं। इनका मुख्य काव्य-संग्रह है-‘आत्महत्या के विरुद्ध, ‘हंसो हंसो जल्दी हंसो, ‘सीढियों पर धूप में, ‘लोग भूल गए हैं, ‘कुछ पते कुछ चिट्ठियां आदि। मुख्य कविताएं हैं-पहले बदलो, लोकतन्त्र का संकट, समझौता, मौक़ा, अरे, अब ऐसी कविता लिखो, पराजय के बाद आदि।
रघुवीर सहाय दैनिक ‘नवजीवन’ में उपसंपादक और सांस्कृतिक संवाददाता रहे। ‘प्रतीक’ के सहायक संपादक, आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक, ‘कल्पना’ तथा आकाशवाणी में विशेष संवाददाता रहे। उन्होंने 1982 से 1990 तक स्वतंत्र लेखन किया।
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सहाय ने अपनी कृतियों में उन मुद्दों, विषयों को छुआ जिन पर तब तक साहित्य जगत में बहुत कम लिखा गया था। उन्होंने स्त्री विमर्श के बारे में लिखा, आम आदमी की पीडा ज़ाहिर की और 36 कविताओं के अपने संकलन की पुस्तक ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ के जरिए द्वंद्व का चित्रण किया। सहाय एक बडे और लंबे समय तक याद रखे जाने वाले कवि हैं। सहाय राजनीति पर कटाक्ष करने वाले कवि थे। मूलत: उनकी कविताओं में पत्रकारिता के तेवर और अख़बारी तजुर्बा दिखाई देता था। भाषा और शिल्प के मामले में उनकी कविताएं नागार्जुन की याद दिलाती हैं।
रघुवीर सहाय को 1982 में ‘लोग भूल गए हैं ‘कविता संग्रह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। रघुवीर सहाय का निधन 30 दिसंबर 1990 को नई दिल्ली में हुआ था।
