चैत रंग उत्सव में नाटक हंस जाई अकेला का हुआ मंचन। विवेक कुमार के एकल अभिनय की दर्शकों ने की जमकर तारीफ। निर्देशक राजेश कुमार को भी मिली प्रशंसा।
चैत रंग उत्सव 2025 – पटना, मुकेश महान। पटना के एग्जिबिशन रोड में होटल लेमन ट्री के सामने प्रयास रंग अड्डा में आयोजित ” चैत रंग उत्सव 2025″ के द्वितीय संध्या के अवसर पर नाटक “हंसा जाई अकेला” का मंचन किया गया। इसके पूर्व कार्यक्रम का उद्घाटन वरिष्ठ रंगकर्मी सुमन कुमार, “संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली से सम्मानित “, गुड़िया कुमारी, “अध्यक्ष, मागधी बज्जिका फाउंडेशन, फंदा, मुज़फ़्फ़रपुर ” प्रसिद्ध रंगकर्मी मिथिलेश सिंह, वरिष्ठ रंगकर्मी रवि भूषण ‘बबलु’ आदि ने दीप प्रज्वलित कर किया। मंच संचालन रंगकर्मी दीपक आनंद कर रहे थे।

नाटक ‘हंसा जाई अकेला’ प्रसिद्ध कहानीकार मार्कण्डेय की सर्वाधिक चर्चित कहानियां में से एक है। ‘हंसा जाई अकेला ” हंसा कहानी का मुख्य चरित्र है जो एक अबोध व्यस्क है। मोह-माया और छल-प्रपंच से कोसों दूर। पूरे गांव में वह उपहास का पात्र है। उसका पूरा समय गीत-गवनई में बीतता है। हंसा गांधी जी से अत्यंत प्रभावित है। हंसा के जीवन में सुशीला नामक गांधीवादी महिला का आगमन होता है और हंसा मन ही मन सुशीला से प्रेम करने लगता है। सुशीला से मिलने के पहले वह पूरा समय व्यर्थ में बीताता था लेकिन सुशीला के आगमन के बाद वह समर्पित कार्यकर्ता बन जाता है। हंसा और सुशीला के संबंधों को लेकर अफवाहें फैलने लगती है। पूरी कहानी की पृष्ठभूमि में गांधीवादी विचारधारा और स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद का पहला आम चुनाव है। सुशीला की असामयिक मृत्यु होती है और हंसा मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाता है। नाटक में स्वतंत्रेतर भारत में व्याप्त जातिवाद की विद्रुपताओं को बारिकी से उकेरते हुए इस समस्या पर भी गंभीरता से कटाक्ष किया गया है।
विवेक कुमार का एकल अभिनय बहुत ही सरल और सहज था। आमतौर पर एकल अभिनय वाली प्रस्तुति को दर्शकों को अपने से जोड़े रखना थोड़ा मुश्किल होता है, लेकिन इस प्रस्तुति में विवेक कुमार अपने अभिनय क्षमता से प्रस्तुति और दर्शकों के बीच लागातार रिश्ता और संवाद बनाये रखा। निश्चित रूप से ववेक इसके लिए बधाई के पात्र हैं।
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नेपथ्य से रवि भूषण ‘बबलु’ अपने प्रकाश संयोजन और संचालन से लगातार प्रस्तुति को गति देते रहे।
नूतन कुमारी की रूप सज्जा और मंजू शर्मा का वस्त्र विन्यास भी प्रस्तुति की मांग को पूरा करती नजर आई।
अनिष कुमार की ध्वनि व्यव्स्था और संचालन नाटक को वास्तविकता के करीब ले जाने में सफल रहे। निश्चत रूप से इस सफल प्रस्तुति के लिए निर्देशक राजेश कुमार विशेष रूप से बधाई के पात्र हैं। एकल अभिनय वाली प्रस्तुति उठाने के लिए खास हिम्मत और मिहनत की जरूरत पड़ती है। और इस नाटक में निर्देशकीय मिहनत के साथ उनका परिपक्व अनुभव का भी एहसास होता है। कहानी का नाटयानतरण खुद विवेक कुमार ने ही किया था।





7lav58
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