बिहार के कैमूर (Kaimur)पहाड़ी में मां मुंडेश्वरी का प्राकट्य स्थल है और दूरदराज से श्रद्धालु यहां हर माह दर्शन-पूजन को आते हैं। Kaimur के अनसुलझे साक्ष्य आज भी शोध के विषय हैं। कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में अभी एक शिलालेख पड़ा हुआ है, जिसके बारे में यह बताया जाता है कि 349 से 636 ई. का है। इस मंदिर का जिक्र अपनी पुस्तक में कनिंघम ने भी किया है। मंदिर की प्रमाणिकता के संदर्भ में कहीं से कोई संशय की गुंजाइश नहीं।
1838 से लेकर 1904 ई. तक ब्रिटिश पर्यटक तथा विद्वानों का यह आकर्षण का केन्द्र रहा। जानकार मानते हैं कि इस मंदिर में पूजन की प्रथा दो हजार वर्ष से अधिक पुरानी है। माता का आशीर्वाद लेने के दौरान एक सनातनी भक्त से हमारी मुलाकात हुई।सुनील सिंह नामक उस दिव्य पुरूष ने माता मुंडेश्वरी देवी के पूजनोपरांत जो कुछ प्रमाणित रूप में बताया वह चौंकाने वाला था।
इस रहस्य का सत्यापन करने हेतु सुनील सिंह ने मुंडेश्वरी देवी की एकतस्वीर दिखाई तो लंकाई पुजारी ने श्रद्धा से एक दू भाषिय को बुलाकर उन्हें समझाने को कहा।
दूभाषिए ने जो बताया वह और चौकाने वाली बातें थी।उसने कहा कि “बिहार के कैमूर पहाड़ी के एक टीले पर लंकापति रावण का तथाकथित हेलीपैड था। उक्त स्थान पर लंकाई कुलदेवी मुनेश्वरी की प्रतिकृति स्थापित की गई थी,जहां वे पूजन किया करते थे।उसी क्षेत्र का अधिपति ताड़कासुर तथा बकासुर राक्षस था जो अन्य ऋषि के साथ विश्वामित्र की कुटि को नष्ट कर यज्ञ कार्य में बाधा डाला करता था। आखिरकार भगवान श्री राम ने मिथिला जाने के क्रम में उन राक्षसों से त्राण दिलाया था। इस बिना पर भी मुंडेश्वरी स्थल को रामायण काल खंड त्रेता युग से जोड़कर देखना उचित होगा। मुगल आक्रांताओं ने यहां की सभी प्रतिमाओं को खंडित कर स्वर्ण की लूट की थी ।आज भी इस पौराणिक मंदिर की कई खंडित प्रतिमाएं पटना संग्रहालय में सुरक्षित हैं। शोधकर्ता सुनिल सिंह का दावा है कि बिहार के “मुंडेश्वरी धाम की विस्तृत व अनोखा एलबम लंका दौरे के क्रम में पौराणिक”मुनेश्वरी स्थान के मुख्य धर्माधिकारी को वहां सौपा तो वे अचंभित हो गये और सिंह जी को आशीर्वाद दिया, साथ ही कुलदेवी कह वे भावनाओं में खो गये।
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अनायास बिहार की “मुंडेश्वरी और श्रीलंका की देवी मुनेश्वरी”को पा कर वे अलौकिक अनुभव करने लगे। आगे सुनील सिंह ने बताया कि कैमूर पर्वत श्रृंखला, विंध्य की पहाड़ियों की यादों से जुड़ी है, जिनमें तीन शक्तिपीठ हैं । विंध्याचल में महालक्ष्मी, मैहर क्षेत्र में सरस्वती तथा मुंडेश्वरी में काली मां विराजमान हैं। केवल मुंडेश्वरी ही खंडित अवस्था में हैं। भक्त सुनील सिंह ने अपने शोध व जिज्ञासा तथा लंका भ्रमण के दौरान बातचीत के आधार पर कहा कि कोलंबो से करीब 130 किमी दूर आज भी अति प्राचीन मुनेश्वरम् नामक एक स्थल है जो धनकुबेर को समर्पित है। यहां की
भद्रकाली तथा महादेव की पूजा जीवंत मानी गई है। वहां कभी देवी के 9 रूपों की पूजा होती थी, परंतु आज पांच मूर्तियां विलुप्त हो गई हैं। अकारण दोनों स्थानों में समानता नहीं है। इसके पीछे तथ्य से जुड़े सरोकार भी हैं। एक शक्ति स्वरूप हैं तो वहीं दूसरी कालरात्रि के रूप में पूजित हैं।
कैमूर पहाड़ी पर स्थित देवी भैंसे पर विराजमान हैं, जो दुर्गा सप्तशती में देवी महिषासुर मर्दिनी के रुप में जानी जाती हैं।खंडित मुंडेश्वरी धाम मंदिर के प्रवेश द्वार पर दक्षिणाभिमुख शिव स्थापित है और मुख्यमंदिर से भग्न मां की कालरात्रि की प्रतिमा अंदर गर्भ क्षेत्र में स्थापित की गई हैं।आपको यह सुखद आश्चर्य होगा कि श्रीलंका के मुनेश्वरी मंदिर में भी इस जैसी प्रतिमा भैसे पर विराजमान हैं। दोनों स्थलों का सूक्ष्म अवलोकन के उपरांत यह कहना तर्कसंगत है कि रहस्य और रोमांचक क्षेत्र के रूप में मां मुंडेश्वरी स्थान के साथ वह पहाड़ी भी है, जो पुरातात्विक महत्व और रहस्य का है ।
शोध के दौरान उन्हें जो जानकारी मिली, उसके आधार पर यह कहना है कि महाप्रतापि रावण का “वॉर रूम”, ताड़कासुर तथा बकासुर राक्षस का विध्वंस स्थल के साथ ऋषि विश्वामित्र व मां मुंडेश्वरी का आस्था क्षेत्र यह पहाड़ी सैलानियों के लिए कौतुहल भरा है।
शम्भू देव झा।