मुजफ्फरपुर में दिनकर जयंती समारोह सह कवि सम्मेलन का आयोजन
मुजफ्फरपुर, सविता राज। दिनकर जंयती के बहाने मुजफ्फरपुर में याद किये गए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर । इस मौके पर दिनकर जयंती और कवि सम्मेलन का आयोजन भी किय गया। यह आयोजन राष्ट्रकवि दिनकर अकादमी और भारतीय युवा रचनाकार मंच के संयुक्त तत्वावधान में छोटी सरैयागंज के श्री नवयुवक समिति ट्रस्ट भवन के सभागार में आयोजित किया गया।
दिनकर जयंती समारोह एवं कवि सम्मेलन की अध्यक्षता अकादमी के अध्यक्ष देवेंद्र कुमार कर रहे थे। राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ भगवान लाल साहनी; राष्ट्रकवि दिनकर अकादमी के निदेशक आचार्य चंद्र किशोर पाराशर; देवेंद्र कुमार; शुभ नारायण शुभंकर; सुमन कुमार मिश्रा; डॉक्टर हरीकिशोर प्रसाद सिंह ने सामूहिक रूप से दीप प्रज्वलित कर वैदिक मित्रों के बीच कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
अपने उद्घाटन भाषण में डॉक्टर भगवान लाल साहनी ने राष्ट्रकवि दिनकर को हिंदी साहित्य ही नहीं अपितु संपूर्ण भारतीय भाषाओं के साहित्य का शिखर पुरुष बताते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में शौर्य और आग है, तो दूसरी ओर राग और वात्सल्य भी है। ऐसा सामंजस्य बहुत ही काम साहित्यकारों में मिलता है। डॉक्टर सहनी ने कहा कि दिनकर को राष्ट्रवाद के प्रखर स्वर के रूप में रूप में जाना जाता है। उनका वह स्वर सन 1962 में भारत चीन युद्ध के समय भी “परशुराम की प्रतीक्षा” कृति के रूप में प्रकट हुई थी जिसे पढ़कर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की रूह कांप गई थे।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और राष्ट्रकवि दिनकर अकादमी के निदेशक आचार्य चंद्र किशोर पाराशर ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने हिंदी साहित्य को अपनी रचनाओं के माध्यम से जितना समृद्ध बनाया उसका मूल्यांकन सही रूप में नहीं किया गया है। वस्तुतः राष्ट्रकवि दिनकर भारत रत्न के सम्मान के योग्य हैं। आचार्य पाराशर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मांग किया कि आज तक किसी भी साहित्यकार को भारत रत्न का सम्मान नहीं मिला है। राष्ट्रकवि दिनकर इसके असली हकदार हैं। इसलिए आने वाले वर्ष में दिनकर जी को भारत रत्न के सम्मान से अलंकृत किया जाना केंद्र सरकार का दायित्व है। आचार्य पाराशक ने बिहार सरकार और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर आरोप लगाया कि वह साहित्यकारों की उपेक्षा करते हैं और प्रदेश के विद्यालय एवं महाविद्यालय के हिंदी पाठ्यक्रम में दिनकर जैसे मूर्धन्य साहित्यकार को हाशिये पर रखते हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मांग किया कि दिनकर की रचनाओं को विद्यालय से महाविद्यालय तक संपूर्णता में पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
अपने अध्यक्षीय के संबोधन में साहित्यकार देवेंद्र कुमार ने कहा कि राष्ट्रकवि दिनकर कालजयी रचनाकार हैं, जिनकी रचनाएं युवा पीढ़ी को देशभक्ति और पुरुषार्थ बनने की प्रेरणा देती है।धन्यवाद ज्ञापन करते हुए शुभ नारायण शुभंकर ने कहा कि यदि दिनकर नहीं होते तो भारतीय वाङ्मय का आधुनिक स्वरूप उभर कर सामने नहीं आता।
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राष्ट्रकवि दिनकर जयंती समारोह के दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसका संचालन सविता राज ने किया। काव्य पाठ का शुभारंभ युवा कवि उमेश राज ने अपने गीत “मैं हूं अकिंचित प्रेम का प्रिया” से किया। अभय कुमार शब्द ने “आग लिखता हूं राग लिखता हूं” गीत का सस्वर पाठ कर तालियां बटोरी। हरीकिशोर प्रसाद सिंह ने बज्जिका भाषा में “जय बज्जिका” गीत प्रस्तुत किया। सविता राज की गजल “एक दिन छोड़कर दुनिया से चले जाना है” भी बहुत पसंद किया गया। युवा कवि सुमन कुमार मिश्रा ने “जब भी आंखें तैरता है प्याज” शीर्षक व्यंग्य की प्रस्तुति की। डॉक्टर मंटू शर्मा ने “हे मेरे भारत के पुत्रों” शीर्षक कविता का पाठ किया। चंदन पांडे ने “जरा देखो क्या हुआ मनुष्य कितना बुरा हुआ” रचना की प्रस्तुति की।
शुभ नारायण शुभंकर ने “गीत एक मैं सुन रहा हूं दिनकर जी के सम्मान में” गीत पढ़कर श्रोताओं को झुमाया। आचार्य चंद्र किशोर पाराशर ने हिंदी गजल “तेजाब सावन में बरसता है हमारे गांव में; चांदनी में पांव जलता है हमारे गांव में” की प्रस्तुति से वाहवाही बटोरा। अध्यक्षीय काव्य पाठ करते हुए देवेंद्र कुमार ने “दूर देश हटिया विकास भागातील” शीर्षक भोजपुरी गीत की प्रस्तुति की। अंत में धन्यवाद ज्ञापन शुभ नारायण शुभंकर ने किया।





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