Film Star Manoj Kumar नहीं रहे, भारत कुमार के नाम से भी जाने जाते थे अभिनेता-निर्देशक मनोज कुमार। इनके निधन के साथ ही फिल्मों में राष्ट्रभक्ति की एक धारा का समापन हो गया। दरअसल अपने समय में वो फिल्म जगत में राष्ट्र भक्ति के पर्याय माने जाते थे। मनोज कुमार 4 अप्रैल 2025 सुबह 3.30 बजे के करीब इस दुनिया को अलविदा कह गये। इनका वास्तविक नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी था। लेकिन 5 फिल्मों में इनके चरित्र के नाम भारत कुमार था। और इन्होंने राष्ट्रभक्ति पर आधारित कई फिल्में भी बनाई और उसमें काम भी किया। इसलिए इ्न्हें भारत कुमार का उपनाम भी दिया गया।फिल्म जगत में ये भारत कुमार से भी जाने जाते थे।
प्रारंभिक जीवन
Film Star Manoj Kumar का जन्म 24 जुलाई 1937 को आज के पाकिस्तान के एबटाबाद में हुआ था। वो जन्म से पंजाबी हिन्दू ब्राह्मण हिन्दू थे। देश विभाजन के कारण उन्हें परिवार सहित मात्र 10 वर्ष की अवस्था में ही दिल्ली आना पड़ा। शुरुआत में उनका परिवार शरणार्थी कैंप में रहता था। बाद में परिवार विजय नगर और फिर राजेंद्र नगर में भी रहा। मनोज कुमार ने दिल्ली में ही हिन्दू कॉलेज से कला स्नातक की पढाई पूरी की। वह अपने छात्र जीवन में ही पढ़ाई के साथ-साथ अभिनय और कविता के रंगों में डूबे रहते थे।इनकी कविताओं में भी देशभक्ति की भावना परिलक्षित होती थी। वह बचपन से ही अभिनेता दिलीप कुमार, अशोक कुमार और कामिनी कौशल से प्रभावित थे। ये ही कारण रहा कि फिल्म शबनम में दिलीप कुमार के चरित्र के आधार पर उन्होंने अपना नाम मनोज कुमार रख लिया।

फिल्मों के लिए संघर्ष
दस साल की उम्र में देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आना, शरणार्थी का जीवन जीना और महज 19 साल की उम्र में दिल्ली से अपनी आंखों में स्वर्णिम सपनों को लेकर तब के बॉम्बे पहुंच जाना मनोज कुमार के लिए कम हिम्मत की बात नहीं थी। 9 अक्टूबर 1956 को ये चकाचौंध के शहर मुंबई पहुंचे थे।ट्रेन का सफर तो ज्यादा मुश्किल भरा नहीं था। लेकिन सड़क से ग्लैमर तक का सफर बहुत ही मुश्किल भरा था। न कोई पहचान, न सिफारिश, न गॉडफादर, न कोई फिल्मी बैंकग्राउंड। सिर्फ मजिल पाने का उनका जुनून और विश्वास उनके पास था। फिल्मों की चकाचौंध के पीछे छिपी कठिनाइयों से उन्हें खूब जूझना पड़ा। भूखे रहकर भी कई रात उन्हें गुजारना पड़ा था। फिल्मों में रिजेक्शन का सामना तो कई बार उन्होंने किया था।
जब मिली पहली फिल्म
…और अंततः उनके जुनून और विश्वास की जीत हुई। 1957 में उन्हें पहली फिल्म पहचान और दूसरी फिल्म सहारा में काम का मौका मिला। यह बस शुरुआत ही थी।इन फिल्मों ने उनके लिए रास्ते बनाए। फिर 1958 में पंचायत,1959 में चांद और 1960 में कांच की गुड़िया, सुहागरात और पिया मिलन की आस,1961 सुहाग सिंदूर ,रेशमी रूमाल रिलीज हुई । लेकिन इनमें से अधिकांश फिल्में मनोज कुमार के लिए आई -गई बन कररह गई। 1962 में इन्हें पहली बड़ी व्यावसायिक सफलता मिली विजय भट्ट की हरियाली और रास्ता से।इस फिल्म में माला सिन्हा का साथ भी मिला था। फिर इन्होंने पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा।फिल्म शादी (1962), डॉ. विद्या (1962) और गृहस्थी (1963) आईं। इन तीनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन कर इनके सफर को गति दी। मुख्य भूमिका के रूप में इन्हें पहली बड़ी सफलता 1964 में ही रहस्य थ्रिलर वो कौन थी? से मिली। यह फिल्म राज खोसला की थी। इस पिल्म ने इन्हें स्टारडम भी दिया।
स्टारडम –1965–1981:
4 अप्रैल 2025 एक भारतीय अभिनेता, फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक, गीतकार और संपादक थे जिन्होंने लेकिन फिर उनके जहन में देशभक्ति फिल्मों का विचार आया और साल 1965 में आई शहीद उनकी पहली देशभक्ति फिल्म रही, जिसमें उन्होंने देश की आजादी के लिए अपनी जान की कुर्बानी देने वाले शहीद भगत सिंह का किरदार निभाया। 1965 से ही इनके साथ स्टारडम जुडा जो 1981 तक लगातार बढता रहा फिर इन्होंने फिल्म करनी लगभग छोड ही दी। हालाकि इनकी अंतिम रिलीज़ फ़िल्म मैदान-ए-जंग (1995) थी। शहीद ,उपकार, संन्यासी, दस नंबरी, रोटी कपड़ा और मकान, क्रांति, पूरब और पश्चिम जैसी फिल्मों ने इन्हें उंचाई दी। अभिनय का इनका अलग अंदाज और प्रभावशाली संवाद अदायगी को इनकी गहरी और बोलती आंखें विशेष बना देती थी।
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इनका सर्वश्रेष्ठ समय 1967 से लेकर 1977तक रहा जब इन्होंने तक बिना किसी फ्लॉप (फ्लॉप या आपदा) वाली लगातार14 फ़िल्में दीं। उपकार, संन्यासी, दस नंबरी, रोटी कपड़ा और मकान, क्रांति, पूरब और पश्चिम उनके कैरियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म थीं।इनका सबसे बुरा समय1962 से 1964 तक का माना जाता है। जब इन्होंने 10 फिल्में की और कोई भी फिल्म हिट/सुपर हिट/ब्लॉकबस्टर नहीं हो पाई थी। फिल्मों की संख्या के हिसाब से 1962 इनके लिए बेहतर माना जा सकता है। जब उनकी 7 फिल्में प्रदर्शित हुई थी। फैशन (1957) उनकी पहली फिल्म थी जबकि क्रांति (1981) उनकी सर्वाधिक कमाई (5 करोड़) वाली फिल्म थी।