7 मार्च पर विशेष– हमारी विभूतियां:पंडित गोविन्द बल्लभ पंत । स्तंभ हमारी विभूतियां की आज की कड़ी समर्पित है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा पंडित गोविन्द बल्लभ पंत पर। जिसने अपनी प्रतिभा, सेवा, लगन और साधनामय जीवन के कारण विराट यश और अपूर्व गौरव अर्जित किया। इनकी उपलब्धियों केकारण इन पर डाक टिकट भी जारी किया जा चुका है। इस विभूति को वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र कुमार सिन्हा अपनी लेखनी के माध्यम से याद कर रहे हैं। आइए हम भी आज विस्तार से जानते हैं स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा पंडित गोविन्द बल्लभ पंत को।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा पंडित गोविन्द बल्लभ पंत ने अपनी प्रतिभा, सेवा, लगन और साधनामय जीवन के कारण विराट यश और अपूर्व गौरव अर्जित किया था वह उनके विशाल एवं विलक्षण व्यक्तित्व के सर्वथा अनुरूप था।
पंडित गोविन्द बल्लभ पंत का देहान्त 7 मार्च, 1961 को हो गया था। पंत जी 1954 से 1961 तक भारत के गृह मंत्री और उससे पहले कई वर्षों तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। वे लगभग 50 वर्षों तक सार्वजनिक जीवन से जु़ड़े रहे थे। कर्तव्य-परायणता और देश हित को सर्वोपरि था। भारत सरकार ने पतं जी की असाधारण सेवाओं का सम्मान करते हुए उन्हें 1957 में देश का सर्वोच्च सम्मान ‘‘भारत रत्न’’ से विभूषित किया था।
बालक गोविन्द बल्लभ का जन्म 10 सितम्बर, 1887 को अल्मोड़ा जिले के एक छोटे से पर्वतीय गांव खूंट में हुआ था। उनके पिता मनोरथ पंत गढ़वाल जिले में सरकारी सेवक थे। उनके लिए यह सम्भव नहीं था कि वह अपने परिवार को गढ़वाल में अपने साथ रख सकें। अतः चार वर्षीय गोविन्द को लेकर उनकी माँ अपने पिता राय बहादुर बद्रीदत्त जोशी के पास अल्मोड़ा आ गई।

बालक गोविन्द की विद्यालयी शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई थी। आठवीं और दसवीं कक्षा में उन्होंने प्रथम श्रेणी प्राप्त की। 1905 में रैम्जे कॉलेज, अल्मोड़ा से पंत जी ने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। लगभग 18 वर्ष की आयु में पंत जी ने म्योर सेंट्रल कॉलेज, इलाहाबाद में प्रवेश किया। यह वह समय था जबकि 20वीं सदी के उदय के साथ-साथ भारत में भी नवजागरण आ चुका था। इन्हीं दिनों ‘वंग भंग’ आन्दोलन से भारतीय राष्ट्रवाद को बल मिल रहा था। पंडित पंत जो उन दिनों मैक्डॉनल हिन्दू बोर्डिंग हाउस में रह रहे थे, इन सब बातों के प्रति जागरूक थे। यह बोर्डिंग हाउस महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के अथक प्रयत्नों से स्थापित हुआ था और इसके छात्रों का उनसे सीधा सम्पर्क था। अतः मालवीय जी के ऊँचे आदर्शों, परिस्कृत विचारों और चरित्र से पंत जी का प्रभावित होना स्वाभाविक ही था।
फरवरी 1907 में गोपाल कृष्ण गोखले के इलाहाबाद आने पर आम सभा का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू ने की। गोखले ने एक घंटे से अधिक समय तक अपने भाषण में देशवासियों से मातृभूमि के लिए सब कुछ न्योछावर करने के लिए कहा। गोखले के इस ओजपूर्ण वक्तव्य का छात्र पंत के संवेदनशील मन पर गहरा असर पड़ा।
1909 में पंडित पंत ने एलएलबी की परीक्षा पास की। वह विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम रहे और उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। वह कभी बोलते हुए घबड़ाते नहीं थे और उनके तर्क युक्तिसंगत होते थे। उनकी स्मरणशक्ति भी बहुत तेज थी। पंडित पंत ने नैनीताल में वकालत शुरू की और शीघ्र ही वह कुमाऊ क्षेत्र के अग्रणी वकील बन गए।
1916 में पंत जी ने लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कुमाऊ प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था। इस तरह वकालत के साथ-साथ उनका राजनैतिक जीवन भी आरम्भ हो गया। 1926 में जब काकोरी कांड के अमर देशभक्तों पर मुकदमा चलाया गया तो पंडित पंत ने बचाव पक्ष के मुख्य वकील के रूप में अपनी निर्भीकता तथा देशप्रेम का अद्भुत परिचय दिया।
सन् 1928 के 29 और 30 नवम्बर को लखनऊ में साइमन कमीशन के बहिष्कार वाले जुलूस में पंडित पंत ने स्वयं अपने ऊपर घुड़सवार पुलिस के प्रहार को झेलकर अपने साथियों को चोट खाने से बचाया। लखनऊ में हुए इस प्रहार ने उन्हें जीवन भर के लिये शारीरिक रूप से असमर्थ एवं पंगु बना दिया और वे जीवन पर्यन्त कमर सीधी न कर पाये।
1937 में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राज्यों में मंत्रिमंडल बनाना स्वीकार किया तो पंत जी उत्तर प्रदेश के कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गये और इस तरह उत्तर प्रदेश में पहला कांग्रेसी मंत्रिमंडल बना। जब सारे मंत्रिमंडलों ने 1939 तक इस्तीफा दे दिया, पंत जी ने अनोखी सूझ-बुझ और दूरदर्शिता से शासन चलाया। व्यक्तिगत सत्याग्रह के कारण सन् 1940 में पंत जी एक वर्ष के लिए बंदी बनाये गये और बाद में 1942 के असहयोग आन्दोलन के सिलसले में कांग्रेस कार्यकारिणी परिषद के अन्य सदस्यों के साथ अहमदनगर में कैद रखे गये। दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति पर वे केन्द्रीय संसदीय बोर्ड के सदस्य चुने गये और साथ ही उत्तर प्रदेश संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए।
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पंत जी पुनः 1946 में उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिये निर्वाचित हुए और मुख्यमंत्री बने। उन्होंने अपने लगभग आठ वर्ष के कार्यकाल में जनसाधारण की दशा सुधारने का यथाशक्ति प्रयास किया। उन्होंने जमींदारी प्रथा की समाप्ति की, तराई के विस्तृत क्षेत्र के विकास के लिए वहां कर्मठ और परिश्रमी किसानों को बसाया। मुख्यमंत्री के रूप में पंत जी के कुशल शासन का ज्वलंत प्रमाण था 1947 के हिन्दू-मुस्लिम दंगों के दौरान उत्तर प्रदेश में शान्ति बनाए रखना, जबकि पूरे देश में साम्प्रदायिकता का विष फैल रहा था।
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पंडित गोविन्द बल्लभ पंत विनम्र प्रकृति के थे, चाहे मित्र हों, चाहे विरोधी सबके प्रति उनका व्यवहार नम्र था। वे शांति प्रिय और सबके प्रति सद्भाव रखने वाले सच्चे मानवतावादी व्यक्ति थे। उनकी योग्यता, नम्रता, सच्चाई और सरलता तथा निस्पृयता की कहानी आज भी इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।






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