तेज और ओज से लवरेज सुंदर और कोमल चेहरा, ऊपर से स्मित मुस्कान, देखते ही लगता है जैसे कोई रोमांटिक फिल्मों का हीरो हो। जी हां, यहां बात हो रही है भोजपुरी फिल्म और म्यूजिक इंडस्ट्री के एक्टर- डाइरेक्टर दीप श्रेष्ठ की। थियेटर से अभिनय यात्रा की शुरुआत के बाद दीप श्रेष्ठ ने म्यूजिक इंडस्ट्री में खूब धमाल मचाया। लोग इन्हें विडियो किंग कह कर पुकारते थे। शुरुआत भरत शर्मा व्यास, गोपाल राय जैसे लोक गायक के साथ और कल्पना पटवारी के गाये गवनवा ले जा राजा जी और प्यार के रोग भईल को से हुई जो काफी हिट भी रही। शारदा सिन्हा को साथ लेकर लोकगीतों और संस्कार गीतों के साथ धार्मिक गीतों के फिल्मांकन और डाक्यूमेंटेशन में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा। बहुत कम लोग जानते हैं कि भोजपुरी फिल्म के तीसरे दौर की शुरुआत इन्हीं की फिल्म माई के दुलार 2001सेेेेे हुई थी। इसी वर्ष इनका म्यूजिक एलबम गवनवां ले जा राजा जी सुपर डुपर हिट रही थी। इसके बाद ही भोजपुरी फिल्मों का नया तीसरा दौर का सिलसिला शुरु हो गया। यह और बात है कि तीसरे दौर की शुरुआत का श्रेय किसी और फिल्म को मिल रहा है। एक मुलाकात में मुकेश महान ने इनसे लंबी बातचीत की। यहां प्रस्तुत है उनकी रंगयात्रा से जुड़े प्रसंग पर बातचीत के कुछ अंश-
दीप श्रेष्ठ जी रचनात्क मीडिया से आपका जुड़ाव कब और कैसे हुआ ?
-सबसे पहले तो मैं थियेटर से जुड़ा। स्कूल में ही थयेटर से जुड़ाव हो गया था, फिर कॉलेज में भी यह सिलसिला चलता रहा फिर कुछ स्थानीय संस्थाओं से जुड़ कर नाटक किया और करता चला गया।

तब नाटक का माहौल कैसा था ?
बहुत संघर्ष था और अजीब तरह का संघर्ष था। कहीं से कोई सपोर्ट नहीं हुआ करता था। घर में भी परिवार वालों का विरोध था। परिवार के लोग नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे नाटक जैसे फालतु चीजों में इनवॉल्व होकर अपना कैरियर बरबाद करें। दोस्त और मित्र भी इसे बेकार समझ कर मजाक उड़ाया करते थे। इसके साथ ही कोई पैसा नहीं होता था हम सब के पास, जो हमलोग रिहर्लसल करने कहीं जा पाएं। आपको बताएं कि मेरे शुरुआती तीन नाटकों का रिहर्लसल मीठापुर इलाक़े और पी एन टी कॉलोनी में हुआ करता था, और हम तब रेलवे ट्रैक पकड़ कर पैदल ही कदमकुआं स्थित अपने आवास से लोहानीपुर होते हुए प्रतिदिन मीठापुर आते -जाते थे। और फिर घर आकर रोज रोज डांट सुनते थे। इसके वाबजूद नाटकों का जुनून थमने का नाम नहीं लेता था।
आपके शुरुआती नाटक कौन कौन थे ?
मेरी रंग यात्रा कलियुग का रावण, फ़ैसला, अख़बार के चन्द् पन्ने से हुई थी।संस्था का नाम तो याद नहीं, लेकिन इसके निर्देशक रामाशंकर थे और ये नाटक पटना के आईएमहाल में हुआ था।
अभिव्यक्ति के अन्य तमाम माध्यमों से परे थियेटर से जुड़ाव का दीप श्रेष्ठ जी कोई विशेष कारण ?
-उस वक्त न तो इतनी समझ थी, न कोई खास कारण मैं समझ पाया था। बस इतना जानता था कि नाटक करना है और नाटक ही करना है। इसके लिए घर में माता पिता से अक्सर डांट भी सुननी पड़ती थी। कुछ लोग मजाक भी उड़ाया करते थे, लेकिन नाटक के चक्कर में मैं किसी की परवाह नहीं करता था।
नाटक में अभिनय यात्रा आपकी कैसी रही ? – यह तो मेरी पसंद की यात्रा थी, जो मुझे खूब भाती भी थी। यह और बात है कि थियेटर में तब बड़ा संघर्ष था। काम आसानी से नहीं मिलते थे। नाट्य संस्थाएं कम थी, नाटक कम हुआ करते थे। लेकिन तब भी मुझे राजा जैसे महत्वपूर्ण चरित्र की भूमिका मिल जाती थी। तब आईएमए हॉल में नाटक अधिक हुआ करते थे। वहां नाटक करके बहुत ही गर्व होता था।

मंच और नाटकों को समझना कब से शुरु किया आपने ?
– दो तीन नाटक तो खेल खेल में निकल गए, तब हम कुछ कलाकारों ने मणि मधुकर लिखित नाटक “रसगंधर्व ” की योजना बनाई। हमलोगों की संस्था थी कला साहित्यम। इस नाटक के निर्देशक थे अनिल अजिताभ। इस नाटक के लिए हम सबने बहुत मिहनत की। जमकर रिहर्लसल किया। इसके प्रचार -प्रसार के लिए हमसब ने मिलकर लीथो पर तब पोस्टर छपवाया। रात-रात भर जग कर हमने पूरे पटना में उस पोस्टर को चिपकाया। नाट्य प्रदर्शन को लेकर जबरदस्त माहौल पटना में बन गया था। नाटक का सफल प्रदर्शन भी हुआ। प्रदर्शन के लगभग दस दिनों बाद जब अपने मुहल्ले की एक दुकान पर सामान लेने गया तो दुकानदार ने बताया कि कलकत्ता से प्रकाशित आवाज पत्रिका में मेरी फोटो छपी हुई है। जब मैंने नाटक की तस्वीर देखी और खबर पढ़ी तो पहली बार मुझे लगा कि मैं अच्छा और सही काम कर रहा हूं। मुझे और अच्छा करने की जिम्मेदारी का भी पहली बार एहसास हुआ। इसी नाटक से मैं ने अपना नाम दीपक कुमार से बदल कर दीप श्रेष्ठ रखा। लेकिन सच बताऊं तो नाटक की समझ तब आई जब मुझे एनएसडी का एक नाटक भारतीय नृत्य कला के खुले मंच पर देखने को मिला। तब हम सब को लगा कि हम सब तो नाटकों में काफी पीछे हैं। उसके तकनीकी पक्ष, लाइटिंग, साउंड, म्यूजिक, मेकप ड्रेस डिजायनिंग प्रोनाउनसिएसन, डिक्सन और लैंगुएज टोन की समझ तब विस्तार से मेरे समझ में आई। और फिर हम सब बेहतर और बेहतर करते चले गए।
आपकी थियेटर यात्रा बिहार तक ही रही या इससे बाहर भी.. ?
– थियेटर को बेहतर सीखने और करने की ललक मुझे तब के बम्बई तक ले गई। वहां मैं शुरुआत में अदा ग्रुप के साथ जुड़ा। इसी ग्रप के साथ अशलम शेख निर्दशित हास्य नाटक मैं मैके चली मैंने किया। यह नाटक तब का हिट नाटक रहा। इसके कई शो मुम्बई में हुए, फिर पुणे, शोलापुर दमाणी थिएटर में, और बुराहनपुर मध्यप्रदेश में भी इसके शो हुए। इसके बाद पृथ्वी थियेटर से जुड़ कर भी कुछ अच्छे नाटकों में काम करने का मौका मिला। जिसमें बादल सरकार लिखित नाटक मादा कैक्टस इत्यादि थे।इसी दौरान फिल्मों की ओर भी मुखातिव हुआ। तब के बम्बई के जुहू स्थित पोपट स्कूल में नाटकों का रहर्लसल हुआ करता था। वहां नाटकों के सारे दिग्गजों और फिल्मों के निर्माता -निर्दशकों का जुटान हुआ करता था। वहीं मेरा परिचय फिल्मी लोगों से हुआ । लेकिन पारिवारिक कारणों से मुझे वापस पटना आना पड़ गया, जिसके कारण कुछ दिनों के लिए थियेटर की गतिविधियां मेरी वाधित रहीं।
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फिर बड़े पर्दे की शुरुआत कैसे ?
– बम्बई रहने के क्रम में मेरी मुलाकात और परिचय कुछ निर्माता- निर्देशकों से भी हो गई थी। निर्माता निर्देशक प्रकाश झा से भी मेरा परिचय वहीं हुआ था। जब वो दामुल की योजना बना रहे थे तो उन्होंने मुझे भी उसमें एक रौल दिया था। हालांकि दामुल से पहले मुझे फिल्म आक्रोश के लिए भी कास्ट किया गया था। लेकिन आक्रोश के शुरु होने में देरी थी इसलिए मैंने दामुल को चुना। हालांकि इसके पहले मैं 12 हिन्दी फिल्मों में तब के बड़े बड़े कास्ट के सथ काम कर चुका था लेकिन दुर्भाग्य से इनमें से कोई फिल्में रीलिज नहीं हुई। हां, प्रकाश झा के साथ काम करके फिल्म तकनीकों की समझ तो आई ही, साथ में यह भी समझ में आया कि जुगार से भी फिल्म बनाई जा सकती है। दामुल को नेशनल अवार्ड भी मिला। इसका फाएदा मुझे आगे तब मिला जब मैंने अपनी फिल्म बनाई।





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