सावन शुरू होते ही बहनें इस माह के पूर्णिमा का इंतज़ार करने लगती हैं। इसी माह के पूर्णिमा को वे अपने भाइयों की दाहिनी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर दृष्ट तथा अदृष्ट विघ्नों से उनके रक्षा की कामना करती हैं न सिर्फ उनके रक्षा की कामना करती हैंबल्कि अपने संबंध की प्रगाढ़ता की भी कामना करती हैं
रक्षाबंधन 2023 आने को है। लेकिन इस साल दुविधा यह है कि राखी का त्योहार कब मनाया जाएगा। 30 अगस्त या 31 अगस्त को। आपके लिए इस आलेख में यह दुनिधा दूर की जा रही है। पढ़िए इस आलेख को और जानिए कि वर्ष 2023 में किस दिन और किस समय सर्वोत्तम मुर्हूत होगा पक्षा बंधन का। रक्षासूत्र या राखी बांधने की शुरुआत की कथा की प्राचीनता देवासुर संग्राम से जुड़ी है। देवासुर संग्राम में एक समय ऐसा भी आया जब यह लगने लगा कि अब देवताओं कि पराजय तय है।सभी देव चिंतित होकर गुरु बृहस्पति के पास गए। देव और बृहस्पति के बीच हो रहे संवाद को संयोग से इन्द्राणी भी सुन रही थी।
इसी वार्तालाप के आधार पर इंद्राणी ने यह निर्णय लिया कि मैं पूरे विधान से उस रक्षा सूत्र का निर्माण करुँगी जो इंद्र की रक्षा कर सके।उसने रक्षा सूत्र तैयार किया और ब्राह्मणों को देकर उसे इंद्र की कलाई पर बांधने के लिए कहा। ब्राह्मणों ने मंत्रोच्चार करते हुए रक्षा सूत्र को इंद्र की कलाई पर बाँधा।परिणामतः युद्ध में इंद्र की विजय हुई।तभी से प्रत्येक वर्ष सावन पूर्णिमा को इसे मनाने की परम्परा शुरू हुई।
श्रीकृष्ण को भी बांधी जाती थी राखी
द्वापर युग भी में रक्षाबंधन मनाया जाता था। सुभद्रा द्वारा भी श्रीकृष्ण को राखी बांधने का प्रसंग मिल जाता है।
‘राखी बाँधत बहिन सुभद्रा बल अरु श्री गोपाल के कंचन रत्न थार भरी मोतीतिलक दियो नंदलाल के ॥‘ यहाँ तक की माता जसोदा भी अपने ललन की रक्षा के लिए उनकी कलाइयों पर रक्षा सूत्र बांधती थीं। ‘माता जसोदा राखी बाँध बल कें श्रीगोपाल कें। कनक-थार अच्छीत, कुंकुम लैतिलकु कियो नंदलाल के॥ ‘अर्थात रक्षाबंधन में बहन के हाथों भाई को,श्रेष्ठ व्यक्ति द्वारा महिला एवं पुरुष सभी को, ब्राह्मण अथवा गुरु का यजमान तथा शिष्य को राखी बांधे जाने का विधान है। व्रज में तो जौ के पौधे को भी राखी बांधने का विधान है।
रक्षा बंधन का मनोवैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय पहलू
रक्षा बंधन का मनोवैज्ञानिक एवं चिकित्स्कीय पहलू भी है। मनोवैज्ञानिक पहलू तो यह है कि हर आने वाले विघ्न से अब हमारी रक्षा होगी,ऐसा बल प्राप्त होता है। चिकित्सकीय महत्व को देखें तो वह यह कि इससे रक्तचाप नियंत्रित रहता है। भविष्य पुराण में तो कहा गया है कि इस समय धारण किया गया रक्षा सूत्र वर्ष पर्यन्त समस्त रोगों से रक्षा करता है।
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रक्षाबंधन 2023 में भद्रा विचार
रक्षाबंधन में भद्रा विचार, भद्रा में कुछ संस्कार एवं कार्य वर्जित हैं, जिनमें से एक रक्षाबंधन भी है। इसलिए भद्रा के बारे में जानना आवश्यक है। एक तिथि में दो करण होते हैं। जब विष्टि नामक करण आता है तब उसे ही भद्रा कहते हैं।भद्रा का वास जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में होता है तब भद्रा का वास पृथ्वी पर होता है। चंद्रमा जब मेष,वृष, मिथुन या वृश्चिक में रहता है तब भद्रा का वास स्वर्गलोक में होता है। जब चन्द्रमा कन्या, तुला, धनु या मकर राशि में चंद्रमा स्थित होता है तो भद्रा का वास पाताल लोक में होता है।भद्रा जिस लोक में रहती है वहीं प्रभावी रहती है। इस प्रकार जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में होगा तभी वह पृथ्वी पर असर करेगी अन्यथा नही।
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रक्षाबंधन 2023 का सर्वोत्तम मुर्हूत कब
सावन पूर्णिमा की शुरुआत 30 अगस्त को सुबह 10:58 बजे होगी। इस समय विष्टि करण रहेगा। इसी दिन सुबह 10 बजकर 19 मिनट में चन्द्रमा कुंभ राशि में प्रवेश करेगा। अर्थात भद्रा का वास पृथ्वी पर होगा। 30 अगस्त को रात्रि 9 बजकर 01मिनट तक विष्टि करण रहेगा। इसके बाद करण परिवर्तित होगा। 31 अगस्त को सुबह 7 बजकर 07 मिनट तक पूर्णिमा रहेगा। हालाँकि चन्द्रमा इस समय भी कुंभ राशि में रहेगा परंतु विष्टि करण नहीं रहेगा।इसलिए 31 अगस्त को सुबह 7 बजकर 07 मिनट से पहले रक्षा सूत्र बांधे जाने या रक्षाबंधन 2023 का उत्तम मुहूर्त है।
बी कृष्णा (ज्योतिषी, योग और अध्यात्मिक चिंतक )





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